Wednesday, March 25, 2009

फ़ेसबुक पर फ़साद

फ़ेसबुक एक बार फिर अपने उपयोक्ताओं की आलोचना का शिकार हो गया है। इस बार विवाद की जड़ है फ़ेसबुक का नया रूप-रंग। क़रीबन 17 लाख फ़ेसबुक उपयोक्ता नई डिज़ाइन से क़तई ख़ुश नहीं हैं और उन्होंने अपना विरोध जताने के लिए यह ग्रुप भी बनाया है। दरअसल नई डिज़ाइन का मक़सद एक तरफ़ जहाँ फ़ेसबुक को ट्विटर के मुक़ाबले खड़ा करना है, वहीं दूसरी ओर विज्ञापनों को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से दिखाना भी है। नई और पुरानी डिज़ाइन के अपने-अपने गुण-दोष हैं। जहाँ तक फ़ेसबुक का सवाल है, उसने पुरानी डिज़ाइन पर लौटने की मांग को नकार दिया है। लेकिन अगर आप पुराने रूप-रंग के कुछ ज़्यादा ही अभ्यस्त हो चुके हैं और उसे ही इस्तेमाल करते रहना चाहते हैं, तो आपके लिए एक आसान-सी जुगाड़ है। तीन आसान क़दमों में आप अपना पुराना फ़ेसबुक वापस पा सकते हैं -

  1. "फ़ेसबुक डेवलपर्स" एप्लीकेशन को जोड़ें (यहाँ से)
  2. "गो टू एप्लीकेशन" पर क्लिक करें और पेज बन्द कर दें
  3. फिर यहाँ जाएँ

आसान-सी जुगाड़ है। पुराने फ़ेसबुक के शौक़ीन आज़मा कर देखें। हालाँकि मुझे तो नया फ़ेसबुक ही बढ़िया लगता है।

6 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

फेसबुक का फंडा
पड़ जाएगा ठंडा
न फेस गंदा
न बुक गंदी
फेसबुक की फजीहत
पुराने रहो है नसीहत।

अजित वडनेरकर said...

पोस्ट भी बढ़िया, अविनाशजी की प्रतिक्रिया भी बढ़िया...

संजय बेंगाणी said...

नए रूप रंग में वापसी का स्वागत है. बहुत दिनों बाद दिखे...

Pratik Pandey said...

@ अविनाशजी, मुझे तो इस पोस्ट से बेहतर आपकी यह कविता ही लगी :)

@ अजितजी, तारीफ़ के लिए शुक्रिया। लेकिन तारीफ़ के असली हक़दार तो अविनाशजी हैं, उनकी टिप्पणी वाक़ई लाजवाब है।

@ संजय भाई, स्वागत के लिए धन्यवाद। उम्मीद है कि अब मैं जड़त्व से बाहर निकलकर नियमित लिख सकूंगा। :)

संगीता पुरी said...

फेसबुक का इस्‍तेमाल करनेवालों के लिए अच्‍छी खबर और लिंक।

mahashakti said...

हम तो बहुत कम ही जाते है, खैर देखते है

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