ज़िन्दगी…
ऊन के गोले की तरह
खुलती जाती है
आख़िर में रुकती है सिफ़र पर
यादें…
रात भर लहरों की तरह
बहती जाती हैं
थमती नहीं हैं सहर पर
जज़्बात…
पलछिन सागर की तरह
उफ़नते रहते हैं
ठिठकते हैं तो तेरी नज़र पर
वजूद…
मुश्किल पहेली की तरह
उलझता जाता है
हैरान हूँ बेबूझ दहर पर




4 comments:
बावला हो गया छे....
अचानक कविता-सविता करै लागे है....
क्या प्रतीक भाई ई कवित्त कब से रचने लग गये, हम तो आपका फिलिमवा मा खोजत रहे।
प्रमेन्द्र भाई! फिलिमवा न मिली, सो कवित्त में लग गए। कुछ-न-कुछ तो करना ही था। :)
वाह ! यह तो बहुत ही अच्छी कविता लिखी है आपने | मैंने ढूँढने की कोशिश की लेकिन ऐसा जान पड़ता है यह आपकी पहली कविता है | लिखते रहिये, हम पढ़ते रहेंगे |
मैं दोनों भाषाओँ में कविता लिखती हूँ | मेरी हिंदी कवितायेँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं |
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