Wednesday, August 26, 2009

भग्न हृदय की आशा

प्रात पल्लवित हुआ पुष्प
सांझ में मुरझा गया
दिन को कर प्रकाशित सूर्य
निशार्वट में समा गया

भग्न हृदय की अश्रुधार
कपोल पर शुष्क हो गयी
थी जो रसासिक्त कल्पना
आज वो रुक्ष हो गयी

फिर भी इस दुःख-राशि में
आशी को ढूंढता हूँ
फिर शून्य से निर्माण को मैं
अस्तित्व को रूंधता हूँ

6 comments:

ओम आर्य said...

गज़ब की रचना .......बहुत ही सुन्दर .....गहराई है आपकी भावानाओ मे ....खुब्सूरत

ओम आर्य said...

गज़ब की रचना .......बहुत ही सुन्दर .....गहराई है आपकी भावानाओ मे ....खुब्सूरत

mahashakti said...

प्रतीक भाई, बहुत पहले आपकी एक कवित्त पढने को मिली थी, आज दूसरी यह तो वास्‍तव में बहुत अच्‍छी है।

संजय बेंगाणी said...

हताशा में तो नहीं हो?...अच्छी कविता...उत्साह की कामना...

Pratik Pandey said...

@ओम जी,
शुक्रिया ओम जी, कविता पढ़ने और सराहने के लिए।

@प्रमेन्द्र भाई,
धन्यवाद, आपसे प्रेरणा लेकर ही कविता लिख रहा हूँ। :)

@संजय भाई,
हताशा तो ऐसी कोई नहीं है। महज़ एक बेचैनी-सी है। प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर..

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