प्रात पल्लवित हुआ पुष्प
सांझ में मुरझा गया
दिन को कर प्रकाशित सूर्य
निशार्वट में समा गया
भग्न हृदय की अश्रुधार
कपोल पर शुष्क हो गयी
थी जो रसासिक्त कल्पना
आज वो रुक्ष हो गयी
फिर भी इस दुःख-राशि में
आशी को ढूंढता हूँ
फिर शून्य से निर्माण को मैं
अस्तित्व को रूंधता हूँ




6 comments:
गज़ब की रचना .......बहुत ही सुन्दर .....गहराई है आपकी भावानाओ मे ....खुब्सूरत
गज़ब की रचना .......बहुत ही सुन्दर .....गहराई है आपकी भावानाओ मे ....खुब्सूरत
प्रतीक भाई, बहुत पहले आपकी एक कवित्त पढने को मिली थी, आज दूसरी यह तो वास्तव में बहुत अच्छी है।
हताशा में तो नहीं हो?...अच्छी कविता...उत्साह की कामना...
@ओम जी,
शुक्रिया ओम जी, कविता पढ़ने और सराहने के लिए।
@प्रमेन्द्र भाई,
धन्यवाद, आपसे प्रेरणा लेकर ही कविता लिख रहा हूँ। :)
@संजय भाई,
हताशा तो ऐसी कोई नहीं है। महज़ एक बेचैनी-सी है। प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।
बहुत सुन्दर..
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