ज़िन्दगी में जो इक कमी-सी है
आँखों में जो इक नमी-सी है
बहार में भी पतझड़ का जो इक एहसास-सा है
गुमशुदा है इक अरमाँ जो दिल के पास-सा है
हर सांस में जो इक प्यास-सी है
हर आह में जो इक आस-सी है
होश के भीतर छुपी जो इक बेहोशी-सी है
सरगोशियों में भी जो इक ख़ामोशी-सी है
दिन-रात जो इक गहमागहमी-सी है
जिस्म में कहीं रूह इक सहमी-सी है
दिलों के दरम्याँ इक बर्फ़ जो जमी-सी है
छाती के नीचे इक धड़कन जो थमी-सी है
क्या ये स्याह रातें ढलेंगी कभी
क्या ये बंद आँखें खुलेंगी कभी
क्या अंधेरे में कभी आएगा नूर
क्या ये बेचैनी कभी होगी दूर ?




3 comments:
रचना में भावनाओं की सहजता मन मोहनेवाली हैं।
देसी एडीटर
खेती-बाड़ी
क्या ये स्याह रातें ढलेंगी कभी
क्या ये बंद आँखें खुलेंगी कभी
क्या अंधेरे में कभी आएगा नूर
क्या ये बेचैनी कभी होगी दूर ?
-बहुत ही उम्दा भाव और बेहतरीन अभिव्यक्ति!!
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ज़िन्दगी में जो इक कमी-सी है
आँखों में जो इक नमी-सी है
Beautiful creation !
Nice meeting you through this poetry.
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