भारत सरकार तेज़ी-से ‘नेशनल इंटेलीजेंस ग्रिड’ तैयार करने में लगी हुई है, जिसे नेटग्रिड भी कहा जा रहा है। २०११-१२ के वित्त बजट में इस परियोजना के लिए सरकार ने ३९.७५ करोड़ का बजट तय किया है और कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर और भी धन मुहैया कराया जाएगा। दरअसल यह गृहमंत्री पी चिदम्बरम के दिमाग़ की उपज है। चिदम्बरम का मानना है कि आतंकवाद से निपटने के लिए यह परियोजना बहुत कारगर साबित होगी। नेटग्रिड के तहत हर नागरिक की तमाम व्यक्तिगत जानकारी जैसे कि फ़ोन रिकॉर्ड, बैंक ख़ातों की जानकारी, प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेज़, बीमा, इनकमटैक्स, इंटरनेट लॉग्स वग़ैरह की जानकारी एक चुटकी में हासिल की जा सकेगी। इस बारे में सरकार का कहना है कि इन सारी सूचनाओं को इकट्ठा करके रखने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि जब भी इन सूचनाओं की ज़रूरत होगी उन्हें विस्तृत डाटाबेस से खंगाल कर निकाला जा सकेगा। सरकार का मानना है कि घरेलू स्तर पर आतंकवाद का सामना करने के लिए सिर्फ़ यूआईडी (यूनिक आइडेंटिफ़िकेशन) परियोजना काफ़ी नहीं है। इस परियोजना के ज़रिए सरकार किसी भी व्यक्ति और उसकी गतिविधियों को तत्काल ट्रैक कर सकती है। नेटग्रिड पर ‘नेशनल काउण्टर टेररिज़्म सेंटर’ (एनसीटीसी) की व्यापक परियोजना के तहत काम किया जा रहा है।
सरकार चाहती है कि प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी २१ तरह की उपलब्ध जानकारियों आपस में जोड़ा जाए, जो अभी अलग-अलग सरकारी स्तरों पर छितरी हुई हैं। इसके माध्यम से इंटेलीजेंस एजेंसियाँ संदिग्ध व्यक्तियों पर नज़र रख सकेंगी और उनकी गतिविधियों की जाँच कर सकेंगी। दिलचस्प बात यह है कि नेशनल ग्रिड परियोजना के तहत यह सब महज़ एक क्लिक के ज़रिए संभव होगा। सरकार से जुड़ी ११ चुनिन्दा एजेंसियाँ इस ग्रिड को इस्तेमाल करने में सक्षम होंगी। सरकार का दावा है कि इन सूचनाओं का दुरुपयोग रोकने के लिए ख़ास व्यवस्था की जा रही है। दरअसल, हर नागरिक से जुड़ा डाटा संबंधित एजेंसी पर ही रहेगा और ज़रूरत पड़ने पर नेटग्रिड के माध्यम से उसे संसाधित करके व्यवस्थित तरीक़े से निकाला जा सकेगा।
रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (रॉ), इंटेलिजेंस ब्यूरो, मिलिट्री इंटेलीजेंस, रिवेन्यू इंटेलीजेंस, नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल आदि प्रमुख ११ संस्थाएँ नेटग्रिड का उपयोग करेंगी। हर एजेंसी अपने कुछ ख़ास लोगों के माध्यम से नेटग्रिड का उपयोग करेगी। ये विशेषज्ञ एजेंसी व नेटग्रिड के बीच कम्यूनिकेशन के लिए पुल का काम करेंगे और नेटग्रिड से प्राप्त डाटा के विश्लेषण में एजेंसी का मार्गदर्शन करेंगे।
कई विशेषज्ञों और सरकार का मानना है कि यह नई व्यवस्था सरकार के लिए प्रभावी तौर पर आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़े ख़तरों से निपटने के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी। नेटग्रिड सरकारी एजेंसियों का काम कई मायने में आसान कर देगी और उनके बीच के तालमेल में भी काफ़ी सुधार आएगा। सारी सूचनाएँ आपस में जुड़ी होने की वजह से किसी के बारे में तुरन्त सारी जानकारी हासिल करना और उसपर कार्रवाई करना बेहद आसान हो जाएगा। इस ग्रिड के लिए एक केन्द्रिय ‘कमाण्ड सेंटर’ भी होगा, जो ग़ैर-आतंकी हॉटलाइन का काम भी करेगा और दूसरे देशों द्वारा मुहैया कराए गए अन्तर्राष्ट्रीय डाटाबेस से जुड़ा होगा, ताकि संदिग्धों पर पूरी तरह से नज़र रखी जा सके।
२००९ में नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड को विकसित करने का ज़िम्मा महेन्द्रा स्पेशल सर्विस ग्रुप के सीईओ कैप्टन रघु रमन को दिया गया और उन्हें देश में ख़ुफ़िया सूचनाओं के बेहतर आदान-प्रदान व इंटेलीजेंस सूचना-तंत्र को मज़बूत करने के लिए नेटग्रिड के निर्माण का काम सौंपा गया। जहाँ सरकार ‘नेटग्रिड’ को आतंकवाद से सुरक्षा के लिए एक बड़ा क़दम बता रही है, वहीं इस परियोजना को लेकर कई तरह की शंकाएँ भी पैदा हो रही हैं। ‘नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती सूचनाओं की पर्याप्त सुरक्षा और उसके ग़लत इस्तेमाल को रोकना है। भारत में पर्याप्त सुरक्षा मानकों या ‘सेफ़गार्ड’ के अभाव में पहले भी इससे मिलती-जुलती कुछ योजनाएँ विफल हो चुकी हैं। सरकार का कहना है कि इस बाबत पुख़्ता क़दम उठाए जाएंगे, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल नज़र नहीं आती है। सुरक्षा मानकों के बारे में चिदम्बरम ने आश्वासन दिया है और कहा है, “सूचना और जिन लोगों से जुड़ी ये सूचनाएँ हैं, उनके लिए बड़ी तादाद में सेफ़गार्ड की व्यवस्था की जाएगी। नेटग्रिड सूचनाओं को संगृहित नहीं करता, बल्कि उन्हें सिर्फ़ सूचीबद्ध करता है ताकि ज़रूरत के वक़्त उन्हें निकाला जा सके। डाटा चोरी से जुड़ी शंकाओं का कोई आधार नहीं है और न ही इसकी कोई ज़रूरत है।” हालाँकि इस तरह के आश्वासनों के बावजूद ‘आन्ध्र प्रॉजेक्ट’ जैसी इसी तरीक़े की परियोजनाएँ सेफ़गार्ड के अभाव में पहले भी औंधे मुँह गिर चुकी हैं। इसके अलावा विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार इंटेलिजेंस एजेंसियाँ क़ानूनी तरीक़े से काम नहीं करती हैं। ऐसे में उनके द्वारा नागरिकों की तमाम जानकारियों तक पहुँच ख़तरे का संकेत देती है। साथ ही भारत में निजता या प्राइवेसी से जुड़े क़ानूनों की भी सख़्त कमी है और डाटा से जुड़े क़ानून भी अभी बेहद लचर हैं। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति से जुड़ी जानकारियों का ग़लत इस्तेमाल होता है, तो उसके लिए इसे रोक पाना काफ़ी मुश्किल साबित हो सकता है।
नेटग्रिड जैसी परियोजनाओं के साकार होने के साथ सबसे ज़रूरी चीज़ यह है कि साथ में प्राइवेसी और सूचना की सुरक्षा से जुड़े क़ानूनों को मज़बूत करने के लिए जल्द-से-जल्द पहल की जाए, ताकि आम नागरिक के पास सूचनाओं का ग़लत इस्तेमाल होने की दशा में बचाव के लिए क़ानून की ढाल हो। भारत में तेज़ी-से बढ़ता ‘ई-सर्विलिएंस’ भी विशेषज्ञों के मुताबिक़ ख़तरे की घण्टी है। सरकार पहले ही ‘इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलोजी एक्ट’ में बदलाव करके उपयोक्ता द्वारा इंटरनेट पर की जाने वाली गतिविधियों पर नज़र रखने का क़ानूनी तरीक़ा इजाद कर चुकी है। साथ ही सरकार द्वारा प्रस्तावित अन्य क़ानून भी इंटरनेट सेंसरशिप को बढ़ावा देते हैं। ऐसे में कई लोग ‘नेटग्रिड’ को ऑनलाइन प्राइवेसी पर बड़ा आघात मानते हैं, जिसके अन्तर्गत लोगों के ऑनलाइन क्रियाकलापों पर सरकारी नज़र रहेगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इस परियोजना के साथ न सिर्फ़ निजता से जुड़े क़ानूनों को सशक्त किया जाए बल्कि मज़बूत सेफ़गार्ड तैयार किए जाएँ, ताकि सूचनाओं का ग़लत इस्तेमाल रोका जा सके। साथ ही बीच का ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिसमें आतंकवाद से निबटने के नाम पर नागरिकों की गोपनीयता और निजता की ज़रूरतों को बलि न चढ़ाया जाए।




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